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पिता की संपत्ति में नहीं मिलेगा हिस्सा, चाहे बेटा हो या बेटी, जानें क्या हैं कानून और शर्तें

क्या आप सोचते हैं कि पिता की संपत्ति पर आपका जन्मसिद्ध अधिकार है? तो रुकिए! कानून की ये सच्चाई चौंका सकती है। चाहे आप बेटे हों या बेटी, कुछ स्थितियों में आपको कुछ भी नहीं मिलेगा। जानिए किन शर्तों और कानूनों के तहत आपकी दावेदारी खत्म हो सकती है — पढ़िए पूरा सच इस रिपोर्ट में

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पिता की संपत्ति में नहीं मिलेगा हिस्सा, चाहे बेटा हो या बेटी, जानें क्या हैं कानून और शर्तें
पिता की संपत्ति में नहीं मिलेगा हिस्सा, चाहे बेटा हो या बेटी, जानें क्या हैं कानून और शर्तें

विरासत और संपत्ति को लेकर भारतीय समाज में वर्षों से चली आ रही मान्यताएं अब कानून के अनुसार बदल रही हैं। अक्सर यह माना जाता है कि पिता की संपत्ति पर बेटे या बेटी का स्वतः अधिकार होता है, लेकिन यह धारणा हमेशा सच नहीं होती। भारत के उत्तराधिकार कानूनों (Succession Laws) के अनुसार, संपत्ति का बंटवारा कई बातों पर निर्भर करता है — जैसे कि संपत्ति स्व-अर्जित (self-acquired) है या पैतृक (ancestral), और पिता की मृत्यु वसीयत (Will) के साथ हुई है या बिना वसीयत के।

इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि किन परिस्थितियों में बेटे और बेटी को पिता की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता है, और कौन-कौन से नियम व शर्तें लागू होती हैं।

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पिता की संपत्ति में बेटे या बेटी को स्वतः अधिकार नहीं मिलता, खासकर तब जब वह स्व-अर्जित संपत्ति हो और पिता ने वसीयत के माध्यम से उसे किसी और को देने का निर्णय लिया हो। हालांकि, पैतृक संपत्ति में दोनों को समान अधिकार है। इसलिए यह जरूरी है कि नागरिक कानून और उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधानों को सही से समझें, ताकि भविष्य में संपत्ति को लेकर कानूनी परेशानियों से बचा जा सके।

स्व-अर्जित संपत्ति पर पिता का होता है पूरा अधिकार

अगर पिता की संपत्ति स्व-अर्जित (Self-acquired property) है, यानी उन्होंने उसे खुद कमाई या खरीदी से अर्जित किया है, तो उस पर उनका पूर्ण अधिकार होता है। इस तरह की संपत्ति को लेकर वे अपने जीवनकाल में या वसीयत के माध्यम से किसी को भी दे सकते हैं, चाहे वह बेटा हो, बेटी, पत्नी, रिश्तेदार या कोई बाहरी व्यक्ति।

इस स्थिति में बेटा या बेटी केवल इसलिए संपत्ति के हकदार नहीं बन जाते क्योंकि वे पुत्र या पुत्री हैं। अगर पिता वसीयत में उनका नाम नहीं लिखते या संपत्ति किसी और को देने का निर्णय लेते हैं, तो वे उस संपत्ति पर दावा नहीं कर सकते।

वसीयत होने पर वारिसों का अधिकार सीमित

यदि पिता ने वसीयत (Will) बनाई है, तो उसके अनुसार ही संपत्ति का बंटवारा होगा। इस स्थिति में बेटा और बेटी दोनों ही तभी संपत्ति के हकदार होंगे जब उनका नाम वसीयत में स्पष्ट रूप से लिखा गया हो। अगर किसी बच्चे का नाम वसीयत में नहीं है, तो वह संपत्ति का कानूनी उत्तराधिकारी नहीं माना जाएगा।

हालांकि, वसीयत को चुनौती दी जा सकती है अगर यह साबित हो कि वसीयत जबरन, धोखे या मानसिक दबाव में बनाई गई थी। परंतु यह कानूनी प्रक्रिया लंबी और कठिन होती है।

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पैतृक संपत्ति में बेटे-बेटी दोनों को बराबर अधिकार

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) में बेटा और बेटी दोनों का समान अधिकार होता है। 2005 में हुए संशोधन के बाद बेटी को भी बेटे के बराबर उत्तराधिकारी माना गया। इसका मतलब है कि यदि संपत्ति पैतृक है — यानी चार पीढ़ियों से चली आ रही है और पिता ने इसे अर्जित नहीं किया — तो बेटा और बेटी दोनों उसमें बराबर के भागीदार होंगे।

लेकिन यह अधिकार तभी लागू होता है जब पिता की मृत्यु वसीयत के बिना होती है। अगर वसीयत बनाई गई है, तो वही प्रभावी होगी।

मुसलमानों और ईसाइयों के लिए अलग नियम

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम केवल हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन धर्म के अनुयायियों पर लागू होता है। मुसलमानों के लिए शरीयत कानून (Muslim Personal Law) लागू होता है, जिसमें पुरुषों और महिलाओं के हिस्से अलग-अलग तय हैं। ईसाइयों के लिए इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 लागू होता है, जो अलग तरीके से संपत्ति का बंटवारा करता है।

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संपत्ति में अधिकार को लेकर अदालत के निर्णय

संपत्ति विवादों को लेकर कई बार अदालत में बड़े फैसले दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार तब भी मिलेगा जब पिता की मृत्यु 2005 से पहले हो गई हो, बशर्ते संपत्ति पैतृक हो।

वहीं दूसरी ओर, यदि पिता की संपत्ति स्व-अर्जित है और उन्होंने वसीयत बनाकर उसे किसी और को दे दिया है, तो बेटा या बेटी कोर्ट में जाकर भी अधिकार नहीं पा सकते, जब तक कि वसीयत को गलत साबित न किया जाए।

संपत्ति के विवाद से बचने के उपाय

संपत्ति को लेकर परिवारों में विवाद न हों, इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति अपने जीवनकाल में संपत्ति का स्पष्ट विवरण रखे और समय रहते वसीयत तैयार करे। वसीयत पंजीकृत (Registered) हो तो उसे कानूनी रूप से अधिक मान्यता मिलती है और बाद में उस पर सवाल उठाना मुश्किल होता है।

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