
पेंशन विसंगति-Pension Disparity को लेकर एक बार फिर से केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सरकार ने हाल ही में वित्त अधिनियम 2025 के ज़रिए केंद्रीय सेवा पेंशन नियमों में बदलाव किए हैं, जिससे वह पुराने मामलों से छुटकारा पाना चाहती है। लेकिन इससे जुड़ा विवाद न केवल कानूनी मोर्चे पर फंसा हुआ है बल्कि आर्थिक रूप से भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। 2006 से पहले और उसके बाद रिटायर हुए समान रैंक के अधिकारियों के बीच पेंशन के अंतर को लेकर जारी यह विवाद अब 25,000 करोड़ रुपये के अनुमानित बोझ तक पहुंच गया है।
सरकार के इस बदलाव का असली मकसद पेंशन से जुड़े मामलों में बढ़ती अदालती दखल को सीमित करना और पुराने विवादों को बंद करना है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि संबंधित कर्मचारी संगठन और पेंशनभोगी अब तक इस मुद्दे पर अदालतों से कई बार राहत पा चुके हैं। ऐसे में सरकार के लिए यह एक दोधारी तलवार बन गया है — निपटाया न जाए तो अवमानना का खतरा और नकारा जाए तो राजकोष पर भारी बोझ।
2006 से पहले रिटायर अधिकारियों की चिंता
ऑल इंडिया S-30 पेंशनर्स एसोसिएशन और FORIPSO (Forum of Retired IPS Officers) लगातार इस बात को उठा रहे हैं कि 2006 से पहले रिटायर हुए अधिकारियों को 2006 के बाद रिटायर हुए समकक्ष अधिकारियों से कम पेंशन मिल रही है। इन संगठनों ने 01 सितंबर 2008 को DPPW (Department of Pension & Pensioners’ Welfare) द्वारा जारी किए गए एक Office Memorandum (OM) को मुख्य कारण बताया, जिसने पेंशनभोगियों के बीच एक अनुचित और असंवैधानिक अंतर बना दिया।
6वें वेतन आयोग के बाद शुरू हुआ था विवाद
6th Pay Commission लागू होने के बाद 2008-09 में कार्मिक मंत्रालय ने जो OM जारी किया, उसने पुराने और नए पेंशनभोगियों के बीच एक स्पष्ट असमानता पैदा कर दी। इस कारण पुराने अधिकारियों को उन जूनियर्स से कम पेंशन मिल रही थी जो उनके बाद रिटायर हुए। FORIPSO ने विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया कि DG रैंक के IPS अधिकारियों को जानबूझकर कम पेंशन दी जा रही है, भले ही उन्होंने सर्विस के दौरान कितनी भी वेतनवृद्धियां प्राप्त की हों।
CAT और हाईकोर्ट ने दिए आदेश, फिर भी नहीं हुआ समाधान
FORIPSO ने 2012 में CAT (Central Administrative Tribunal) में याचिका दायर की और 2015 में उसके पक्ष में आदेश आया, लेकिन केंद्र सरकार ने उसे लागू नहीं किया। इसके बाद 2024 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी संशोधित पेंशन देने और बकाया भुगतान करने का आदेश दिया। लेकिन जब सरकार ने आदेश नहीं माना, तो फिर से अवमानना याचिका दायर की गई, और मामला अब 16 मई 2025 को फिर से सुनवाई में है।
सरकार का नया दांव
सरकार ने अब Finance Act 2025 के ज़रिए पेंशन नियमों में यह जोड़ा है कि केंद्र सरकार को पेंशनर्स को वर्गीकृत करने और उनके बीच अंतर बनाए रखने का अधिकार है। सरकार का कहना है कि retirement date को ही पेंशन पात्रता का आधार बनाया जाएगा। इससे वह पुराने मामलों से बचना चाहती है। लेकिन यह नियम दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश से टकराता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के DS Nakara (1983) और UOI vs SPS Vains (2008) केसों का हवाला देते हुए कहा गया था कि सेवा समाप्ति की तारीख के आधार पर पेंशन में भेदभाव नहीं हो सकता।
आखिर कितना होगा वित्तीय बोझ?
यदि अदालतें FORIPSO और अन्य संगठनों की मांगों को मान लेती हैं और सभी पात्र अधिकारियों को संशोधित पेंशन और बकाया देना पड़ता है, तो सरकार को प्रति अधिकारी लगभग 14.5 से 16.5 लाख रुपये तक का भुगतान करना होगा। यह आंकड़ा 300 से अधिक पेंशनर्स पर लागू होता है, जिससे कुल अनुमानित खर्च 25,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसे में सरकार अब दो बड़े खतरों के बीच फंसी है — अदालती आदेश का पालन करे तो भारी खर्च, न माने तो अवमानना।